नाम तो कई थे उसके,
मैं,
अक्सर छोटू बुलाता था.
नुक्कड़ की चाय वाले का,
नया छोटू था.
खाकी निक्कर पहना करता था,
लम्बी थी उससे,
टाँगों तक पहुँचती थी,
शर्ट ठीक ठीक याद नहीं,
दो थीं शायद,
प्रमोशन भी हुआ था इधर उसका,
आज कल चाय भी बनाता था,
सोता भी उसी दुकान में,
एक कोने में था,
गए दंगो के बाद से दिखता नहीं,
दुकान पे चाय का स्वाद तो पहले सा ही है,
रंग कभी हरा तो कभी सिंदूरी लगता है..!!
शौर्य जीत सिंह
१५/०२/२०११
Friday, February 18, 2011
Tuesday, January 25, 2011
मूक मन की वेदना
बोलती हैं यह शिलाएं,
गा रही मन की व्यथाएँ,
पर नहीं सोचा किसी ने,
पर नहीं जाना किसी ने,
मूक मन की वेदनाएं!
बोलती हैं यह शिलाएं!!
पठारों की मूर्तियों में,
कौन कहता दिल नहीं
कल्पना सुख की दुखों की,
और मन चंचल नहीं है,
है नज़र तो देख ले,
वह छलकती जल बिन्दुकाएं,
बोलती हैं यह शिलाएं!!
शौर्य जीत सिंह
२००२
गा रही मन की व्यथाएँ,
पर नहीं सोचा किसी ने,
पर नहीं जाना किसी ने,
मूक मन की वेदनाएं!
बोलती हैं यह शिलाएं!!
पठारों की मूर्तियों में,
कौन कहता दिल नहीं
कल्पना सुख की दुखों की,
और मन चंचल नहीं है,
है नज़र तो देख ले,
वह छलकती जल बिन्दुकाएं,
बोलती हैं यह शिलाएं!!
शौर्य जीत सिंह
२००२
जीवन का चित्र बनाता हूँ
मैं कवि हूँ,
युग का दृष्टा हूँ,
जीवन का चित्र बनाता हूँ!!
ये पुष्प हमेशा कहते हैं,
जब मुझसे बातें करते हैं,
तू कष्ट क्लेश के शब्दों में,
आँसू में डूबा रहता है,
मैं कहता हूँ आँसू ही हैं,
संसृति से मुझे जोड़ते हैं,
आँसू से पन्नो को धो कर,
कविता में रंग सजाता हूँ,
मैं कवि हूँ,
युग का दृष्टा हूँ,
जीवन का चित्र बनाता हूँ!!
आँसू मन में उदगार बने,
और आँसू से संसार बने,
असहाय दीं की आँखों से,
निकले आँसू अंगार बने,
मानव ही अश्रु बहता है,
इसलिए श्रेष्ठ कहलाता है,
उस मानव मन की पीड़ा को,
जीवन का सार बताता हूँ,
मैं कवि हूँ,
युग का दृष्टा हूँ,
जीवन का चित्र बनाता हूँ!!
शौर्य जीत सिंह
२००२
युग का दृष्टा हूँ,
जीवन का चित्र बनाता हूँ!!
ये पुष्प हमेशा कहते हैं,
जब मुझसे बातें करते हैं,
तू कष्ट क्लेश के शब्दों में,
आँसू में डूबा रहता है,
मैं कहता हूँ आँसू ही हैं,
संसृति से मुझे जोड़ते हैं,
आँसू से पन्नो को धो कर,
कविता में रंग सजाता हूँ,
मैं कवि हूँ,
युग का दृष्टा हूँ,
जीवन का चित्र बनाता हूँ!!
आँसू मन में उदगार बने,
और आँसू से संसार बने,
असहाय दीं की आँखों से,
निकले आँसू अंगार बने,
मानव ही अश्रु बहता है,
इसलिए श्रेष्ठ कहलाता है,
उस मानव मन की पीड़ा को,
जीवन का सार बताता हूँ,
मैं कवि हूँ,
युग का दृष्टा हूँ,
जीवन का चित्र बनाता हूँ!!
शौर्य जीत सिंह
२००२
Sunday, January 23, 2011
आशा
एक और सुबह,
एक और चाय,
एक और सपना
एक और कोशिश,
एक और नतीजा
एक और हार
एक और शाम
एक और आंसू
एक और हताशा
एक और निराशा
एक और रात
एक और प्रण
कल फिर एक सुबह ..
फिर एक सपना..
शायद कल जश्न हो..
एक और आशा..
शौर्य जीत सिंह
२४-०१-२०११
एक और चाय,
एक और सपना
एक और कोशिश,
एक और नतीजा
एक और हार
एक और शाम
एक और आंसू
एक और हताशा
एक और निराशा
एक और रात
एक और प्रण
कल फिर एक सुबह ..
फिर एक सपना..
शायद कल जश्न हो..
एक और आशा..
शौर्य जीत सिंह
२४-०१-२०११
Sunday, October 24, 2010
अग्निपथ रचता चला हूँ..!!
भावना का वेग ले कर,
शब्द शोलों में दबा कर,
ध्येय का अविराम राही,
साथ कंटक ले चला हूँ,
अग्निपथ रचता चला हूँ |
ओज कण कण में समां कर,
पथिक को पाथेय दे कर,
कर प्रखर वाणी सभी की,
साथ सबको ले चला हूँ,
अग्निपथ रचता चला हूँ |
कष्ट का ही अस्त्र ले कर,
ज्वार हृदयों में उठा कर,
भारती माँ का पुजारी,
छंद माला कह चला हूँ,
अग्निपथ रचता चला हूँ |
शौर्य जीत सिंह
२१-जुलाई-२००४
शब्द शोलों में दबा कर,
ध्येय का अविराम राही,
साथ कंटक ले चला हूँ,
अग्निपथ रचता चला हूँ |
ओज कण कण में समां कर,
पथिक को पाथेय दे कर,
कर प्रखर वाणी सभी की,
साथ सबको ले चला हूँ,
अग्निपथ रचता चला हूँ |
कष्ट का ही अस्त्र ले कर,
ज्वार हृदयों में उठा कर,
भारती माँ का पुजारी,
छंद माला कह चला हूँ,
अग्निपथ रचता चला हूँ |
शौर्य जीत सिंह
२१-जुलाई-२००४
Tuesday, July 20, 2010
ब्रह्म
कई बार कोशिश की,
तुझे कुछ शब्दों में बाँधने की,
एक कविता में समेटने की,
पर सीमित न कर पाया,
कभी भी,
कोई भी,
न पिकासो अपने रंगों में,
न बीथोवेन अपनी तरंगों में,
हाँ तेरा कुछ अंश अवश्य रहा,
हर शब्द, रंग और तरंग में,
इसीलिए,
जब शेष न रहूँगा मैं,
शेष रहेंगे,
मेरे शब्द,
तुझमे सिमटे हुए!
शौर्य जीत सिंह
२० जुलाई 2010
तुझे कुछ शब्दों में बाँधने की,
एक कविता में समेटने की,
पर सीमित न कर पाया,
कभी भी,
कोई भी,
न पिकासो अपने रंगों में,
न बीथोवेन अपनी तरंगों में,
हाँ तेरा कुछ अंश अवश्य रहा,
हर शब्द, रंग और तरंग में,
इसीलिए,
जब शेष न रहूँगा मैं,
शेष रहेंगे,
मेरे शब्द,
तुझमे सिमटे हुए!
शौर्य जीत सिंह
२० जुलाई 2010
Sunday, June 27, 2010
बाबा
एक दिन,
सवेरे,आँख खुली तो,
खुद को सोया हुआ पाया,
उसी खाट पर,
जो आज बूढ़ी हो चुकी है,
शायद तब भी थी,
पर आज,
जर्जर हो चली है,
मैं आँखें मूदें,
किसी गोद में चला जा रहा था,
लोहे के नल के चलने की आवाज़,
कानों में पड़ी तो नींद खुली,
और एक रुखी सी,
गीली हथेली चेहरे को स्नेह देने लगी,
कुछ मीठा गुड,
मुँह में डाला,
और मैं,
अभी भी,
आँखों को पुनः ,
बंद करने की जिद करता रहा था,
"मछली देखने चलें"
काँपती आवाज़ कानों में पडी,
तो मानो स्फूर्ति मन में हिलोरे लेने लगी,
और निद्रा,
अपनी निद्रा में लीं हो गयी
कुछ बासी रोटियाँ लिए,
हम घर के पिछवाड़े,
अपने तालाब पर पहुँचे,
रोटियों के टुकड़े फ़ेकेऔर मछलियाँ ,
सुनहरी,हरी,पीली और जाने कितनी रंगीली,
जल क्रीड़ा करने लगी,
ऐसा सुख , ऐसा आनंद,
पर पीछे,
एक हाथ कंधे पर,
अभी भी आगे न जाने के लिए कह रहा था,
जबरदस्ती कर रहा था
मैं भी आगे जाने की जिद कर रहा था,
कि अर्धनिद्रा से चेता,
लगा,
क्या कुछ भी शेष नहीं था,
सब कुछ समाप्त हो गया,
सब कुछ..!!
मात्र एक स्मृति शेष थी,
बाबा..!!
(February '05)
I'll always miss you a lot Baba..!!
सवेरे,आँख खुली तो,
खुद को सोया हुआ पाया,
उसी खाट पर,
जो आज बूढ़ी हो चुकी है,
शायद तब भी थी,
पर आज,
जर्जर हो चली है,
मैं आँखें मूदें,
किसी गोद में चला जा रहा था,
लोहे के नल के चलने की आवाज़,
कानों में पड़ी तो नींद खुली,
और एक रुखी सी,
गीली हथेली चेहरे को स्नेह देने लगी,
कुछ मीठा गुड,
मुँह में डाला,
और मैं,
अभी भी,
आँखों को पुनः ,
बंद करने की जिद करता रहा था,
"मछली देखने चलें"
काँपती आवाज़ कानों में पडी,
तो मानो स्फूर्ति मन में हिलोरे लेने लगी,
और निद्रा,
अपनी निद्रा में लीं हो गयी
कुछ बासी रोटियाँ लिए,
हम घर के पिछवाड़े,
अपने तालाब पर पहुँचे,
रोटियों के टुकड़े फ़ेकेऔर मछलियाँ ,
सुनहरी,हरी,पीली और जाने कितनी रंगीली,
जल क्रीड़ा करने लगी,
ऐसा सुख , ऐसा आनंद,
पर पीछे,
एक हाथ कंधे पर,
अभी भी आगे न जाने के लिए कह रहा था,
जबरदस्ती कर रहा था
मैं भी आगे जाने की जिद कर रहा था,
कि अर्धनिद्रा से चेता,
लगा,
क्या कुछ भी शेष नहीं था,
सब कुछ समाप्त हो गया,
सब कुछ..!!
मात्र एक स्मृति शेष थी,
बाबा..!!
(February '05)
I'll always miss you a lot Baba..!!
Thursday, April 29, 2010
उलझन
शाम सुखाई छत पर रख के,
बारिश का मौसम ना था,
जाने कब किस छोर से बह कर,
तू घन बन मुझ पर छाई,
शाम से ले कर भोर भी भीगी,
उलझी दोनों इक हो कर,
सुलझाया तो बीच में उलझी,
रात गिरेगी आँगन में,
सुलझाऊं या रहने दूं अब,
उलझी सुलझी सब रातें,
उलझ गया मैं उलझ गया.!!!!
शौर्य जीत सिंह
३०-०४-२०१०
For you....from Me....!!!!
बारिश का मौसम ना था,
जाने कब किस छोर से बह कर,
तू घन बन मुझ पर छाई,
शाम से ले कर भोर भी भीगी,
उलझी दोनों इक हो कर,
सुलझाया तो बीच में उलझी,
रात गिरेगी आँगन में,
सुलझाऊं या रहने दूं अब,
उलझी सुलझी सब रातें,
उलझ गया मैं उलझ गया.!!!!
शौर्य जीत सिंह
३०-०४-२०१०
For you....from Me....!!!!
Wednesday, March 03, 2010
रिश्तों के दाग
चमकीली पन्नी का एक पुराना टुकड़ा देख,
आँखें फिर से नम हो गयीं,
रिश्तों के दाग भी कितने गहरे होते हैं,जाते-जाते जाते हैं....!!!
०३/०३/२०१०
आँखें फिर से नम हो गयीं,
रिश्तों के दाग भी कितने गहरे होते हैं,जाते-जाते जाते हैं....!!!
०३/०३/२०१०
Monday, November 16, 2009
फ़ुर्सत
कभी फ़ुर्सत से मिलूंगा तुझे..
कभी फ़ुर्सत से बातें करेंगे...
ज़िन्दगी फ़ुर्सत में न मिली तो मौत ढूंढेंगे ....!!!
16th November 2009
कभी फ़ुर्सत से बातें करेंगे...
ज़िन्दगी फ़ुर्सत में न मिली तो मौत ढूंढेंगे ....!!!
16th November 2009
Sunday, November 01, 2009
भुलक्कड़पन
कभी आँखों पे चश्मा लगाकर
चश्मा ढूंढता हूँ
तो कभी हाथ में कलम पकड़ कर कलम
और जेब में रखी चाबी तो जाने कितनी बार
दिल में बसी कोई चीज़ भी
यूँ ही कई बार ढूंढी है
उस शून्य को, तुझे और कभी कभी खुद को भी
ये कम्बख्त भुलक्कड़पन दिल तक जा बसा है.....
Spetember 2009
चश्मा ढूंढता हूँ
तो कभी हाथ में कलम पकड़ कर कलम
और जेब में रखी चाबी तो जाने कितनी बार
दिल में बसी कोई चीज़ भी
यूँ ही कई बार ढूंढी है
उस शून्य को, तुझे और कभी कभी खुद को भी
ये कम्बख्त भुलक्कड़पन दिल तक जा बसा है.....
Spetember 2009
ख्वाब
आँखों में उगाया ख्वाब कभी,
सींचा अपने हर आँसू से,
ढांपा पलकों के छप्पर से,
जब जेठ दुपहरी धूप लगी...
इक दिन आया आँसू सूखे
पलकें बोझिल पर नींद नहीं
वो ख्वाब कहीं मुरझाया सा
आँखों में लाली सा खिंच कर ,
बेरंग हुआ और ख़त्म हुआ
जो सजता था इन आँखों में....
August 2009
सींचा अपने हर आँसू से,
ढांपा पलकों के छप्पर से,
जब जेठ दुपहरी धूप लगी...
इक दिन आया आँसू सूखे
पलकें बोझिल पर नींद नहीं
वो ख्वाब कहीं मुरझाया सा
आँखों में लाली सा खिंच कर ,
बेरंग हुआ और ख़त्म हुआ
जो सजता था इन आँखों में....
August 2009
रिश्ते
पिघलते हुए रिश्तों से.......
उम्मीदो की एक लौ........
जला रखी है.......
सोचता हूं......
उम्मीदें बुझा कर बचा लूं इस रिश्ते को......
या कायम रखूं उम्मीदें........
रिश्तों के गर्द बन .......
उड्र जाने तक.........
July 2007
उम्मीदो की एक लौ........
जला रखी है.......
सोचता हूं......
उम्मीदें बुझा कर बचा लूं इस रिश्ते को......
या कायम रखूं उम्मीदें........
रिश्तों के गर्द बन .......
उड्र जाने तक.........
July 2007
मौत
जब सूरज आसमानी होगा
और आसमान लाल
रात सिन्दूरी रंग सी घर कि छत पर टपकेगी
और सवेरा कालिख सा
हर आंख में सजेगा
चांद को कटोरे मे रखे हर भिखारी चुप चाप बैठा होगा
और पतझड के सूखे पत्ते बेल बनकर
सबसे ऊंची मीनार पे बैठेंगे
चलेंगे लोग पनी के जमे समन्दर पे
और धरती दल दल से बिखर जायेगी
हर कदम की आहट पे
जब रगो मे बहता खून
ठेले पे रखे बर्फ़ की सिल्ली बन जम जायेगा
और रिसेगा
हर पल मेरे जिस्म से
जब चिमनियो से निकला धुआं
बहता हुआ घर क रोशनदनो क मुंह बन्द कर देगा
और थिरकती हुई बारिश कि बून्दें
किसी खिड्की कि सूनी दरार मे चुपचाप सो जायेगी
जब आंखो मे गरम पानी क झरना नहीं होगा
बल्कि वो खूनी लाल सांसें लेगी
और सीने मे रखा दिल
चुपचाप
मगर
मेज़ पे रखी एक चिट्ठी
धड्कनों सी फड्फडाएगी
यकीन है मुझे
उस वक्त
मिलूंगा मैं तुझसे
February 2007
और आसमान लाल
रात सिन्दूरी रंग सी घर कि छत पर टपकेगी
और सवेरा कालिख सा
हर आंख में सजेगा
चांद को कटोरे मे रखे हर भिखारी चुप चाप बैठा होगा
और पतझड के सूखे पत्ते बेल बनकर
सबसे ऊंची मीनार पे बैठेंगे
चलेंगे लोग पनी के जमे समन्दर पे
और धरती दल दल से बिखर जायेगी
हर कदम की आहट पे
जब रगो मे बहता खून
ठेले पे रखे बर्फ़ की सिल्ली बन जम जायेगा
और रिसेगा
हर पल मेरे जिस्म से
जब चिमनियो से निकला धुआं
बहता हुआ घर क रोशनदनो क मुंह बन्द कर देगा
और थिरकती हुई बारिश कि बून्दें
किसी खिड्की कि सूनी दरार मे चुपचाप सो जायेगी
जब आंखो मे गरम पानी क झरना नहीं होगा
बल्कि वो खूनी लाल सांसें लेगी
और सीने मे रखा दिल
चुपचाप
मगर
मेज़ पे रखी एक चिट्ठी
धड्कनों सी फड्फडाएगी
यकीन है मुझे
उस वक्त
मिलूंगा मैं तुझसे
February 2007
एक कविता है
एक कविता थी ...
जिसका नाम नहीं रखा..
एक कविता थी...
जो आज भी किसी किताब के ५७ नंबर पेज पे रखी है ...
एक कविता थी...
जिसको सबसे पहले पढने वाला कभी मिला ही नहीं..
एक कविता थी...
जो आज भी अधूरी है ..
एक कविता थी...
जिसमे कोई छंद अलंकार नहीं था..
एक कविता थी...
जो कोरे पन्ने पे पानी से लिखी थी...
एक कविता थी...
जो तेरे दिल पे अपने आंसू से लिखी थी ..
हाँ वो एक कविता ...
वो आज भी है..
एक कविता है..
जो मेरे सबसे पास है..!!!
April 2009
जिसका नाम नहीं रखा..
एक कविता थी...
जो आज भी किसी किताब के ५७ नंबर पेज पे रखी है ...
एक कविता थी...
जिसको सबसे पहले पढने वाला कभी मिला ही नहीं..
एक कविता थी...
जो आज भी अधूरी है ..
एक कविता थी...
जिसमे कोई छंद अलंकार नहीं था..
एक कविता थी...
जो कोरे पन्ने पे पानी से लिखी थी...
एक कविता थी...
जो तेरे दिल पे अपने आंसू से लिखी थी ..
हाँ वो एक कविता ...
वो आज भी है..
एक कविता है..
जो मेरे सबसे पास है..!!!
April 2009
ताजगी
कभी तुम्हारी आँखों की
चमक उधार ली है..
तो कभी होठों की हंसी...
कभी तुम्हारे जिस्म की...
रात भर की बासी खुशबू...
और कभी
अलसाई अंगडाई का..
सोंधा एहसास...
मेरे पास ताजगी जैसा कुछ भी नहीं था..
जो भी खुद पे सजाया...
सब तुमसे पाया...
शायद इसीलिए..
हर इंटरव्यू से पहले...
तुम्हारा माथा चूमा है मैंने....!!!!
April 2009
चमक उधार ली है..
तो कभी होठों की हंसी...
कभी तुम्हारे जिस्म की...
रात भर की बासी खुशबू...
और कभी
अलसाई अंगडाई का..
सोंधा एहसास...
मेरे पास ताजगी जैसा कुछ भी नहीं था..
जो भी खुद पे सजाया...
सब तुमसे पाया...
शायद इसीलिए..
हर इंटरव्यू से पहले...
तुम्हारा माथा चूमा है मैंने....!!!!
April 2009
एक टूटा हुआ टुकडा
नकली मोती का एक टूटा हुआ टुकडा ..
तेरी बाली से गिर कर मेरे बालो में आ फँसा था ...
कई दिनों तक वहीँ पड़ा रहा .
फिर एक समंदर की लहर जाने उसे बहा कर कहाँ ले गयी ..
आज हर लहर में तेरे निशाँ ढूंढ रहा हूँ...जाने किसी डॉलफिन के पर में
नकली मोती में सिमटी तू ही मिल जाये ..!!!!
March 2009
तेरी बाली से गिर कर मेरे बालो में आ फँसा था ...
कई दिनों तक वहीँ पड़ा रहा .
फिर एक समंदर की लहर जाने उसे बहा कर कहाँ ले गयी ..
आज हर लहर में तेरे निशाँ ढूंढ रहा हूँ...जाने किसी डॉलफिन के पर में
नकली मोती में सिमटी तू ही मिल जाये ..!!!!
March 2009
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