Monday, July 09, 2012
Thursday, July 05, 2012
लिबास
उदासियाँ,
एक पोटली में बाँध कर,
सँजो कर रखी है,
पहन लूँगा आँखों पर,
जब ज़रूरत होगी,
रोने की |
खुशियाँ,
किसी छोटे से गट्ठर में हैं,
संदूक में सम्हाल के रखी हैं,
होठों पे पहन लुंगा,
उसको भी,
जब ज़रूरत होगी,
हँसने की |
गुस्सा भी,
किसी पुरानी चादर में लपेट कर,
पड़ा होगा इन सब के ऊपर,
की आसानी से मिल जाए,
जब ज़रूरत हो,
खीझने की |
ये सारे जज़्बात,
लिबास हैं उस मन के,
जिसके मरने की खबर,
मुझे भी ज़रा देर से लगी ||
--
शौर्य जीत सिंह
जमशेदपुर, २९/०६/२०१२
Monday, May 28, 2012
क्या लिखूँ
मैं जानता नहीं ,
कि अब आगे लिख पाऊंगा ,
शब्दों की नुमाइश,
भावना की स्याही से,
सजा पाऊंगा ,
कि जितनी भी रही वजहें,
कलम में रंग भरने की,
वो सारी मिट गयी हैं,
बुझ गयी हैं,
मुझे अब शाम को सूरज बड़ा फ़ीका सा लगता है,
कभी सिंदूरी इसके रंगों में सपने पिरोता था,
नगमें बनाता था;
कई दिन हो गए छत पे गए,
नहीं की चाँद से बातें,
जब उसकी गुफ्तगू औरों को मैं,
कविता बनाकर पेश करता था,
कभी नाराज़ होता था कभी हँसता था वो मुझ पर,
उसी का अक्स था हर लफ्ज़ में
मगर अब वो नहीं दिखता
पराये जान पड़ते हैं
ये सारे शब्द अब मुझको,
कभी मुझको अकेलेपन में
ये साथी से लगते थे,
मैं जानता नहीं ,
कि अब आगे लिख पाऊंगा ,
शब्दों की नुमाइश,
भावना की स्याही से,
सजा पाऊंगा ,
शौर्य जीत सिंह
२८ मई २०१२, गुडगाँव
Monday, May 21, 2012
शौर्य
मैं अटल विश्वास हूँ,
अधिकार हूँ,
अभिमान हूँ,
मैं धरा पे सूर्य,
नभ में रोशनी की चाह में,
अग्नि हूँ,
उल्लास हूँ,
मैं श्रृष्टि का वरदान हूँ,
अनगिनत विघ्नों से आगे,
बढ़ रहा प्रत्येक दिन,
मैं समय की आस हूँ,
उम्मीद हूँ,
आह्लाद हूँ,
मैं शिवा का कंठ,
गीता सार हूँ मैं कृष्ण का,
मैं प्रतिज्ञा भीष्म की,
संसार का आधार हूँ,
मैं चमक हूँ चक्षु की,
मन में बसा अहसास हूँ,
मैं पवन जल अग्नि धरती,
आसमान हूँ,
शौर्य हूँ |
अधिकार हूँ,
अभिमान हूँ,
मैं धरा पे सूर्य,
नभ में रोशनी की चाह में,
अग्नि हूँ,
उल्लास हूँ,
मैं श्रृष्टि का वरदान हूँ,
अनगिनत विघ्नों से आगे,
बढ़ रहा प्रत्येक दिन,
मैं समय की आस हूँ,
उम्मीद हूँ,
आह्लाद हूँ,
मैं शिवा का कंठ,
गीता सार हूँ मैं कृष्ण का,
मैं प्रतिज्ञा भीष्म की,
संसार का आधार हूँ,
मैं सनातन धर्म हूँ,
मैं काल का संवाद हूँ,
पार्थ के रथ की ध्वजा,
पुरुषार्थ हूँ,
परमार्थ हूँ,
परमार्थ हूँ,
मैं चमक हूँ चक्षु की,
मन में बसा अहसास हूँ,
मैं पवन जल अग्नि धरती,
आसमान हूँ,
शौर्य हूँ |
--
शौर्य जीत सिंह,
१९ मई २०१२, गाज़ियाबाद
१९ मई २०१२, गाज़ियाबाद
Sunday, May 13, 2012
मुलाक़ात
प्लेटफ़ॉर्म के उस तरफ,
दो गुज़रती हुई ट्रेनों की खिड़कियों के बीच,
उसका चेहरा दिखा,
और कुछ देर बाद,
ओझल हो गया,
ना जाने कौन सी खिड़की में गुम हो गया,
मुलाक़ात बरसों बाद की थी,
जो शुरुआत से पहले ही ख़तम हो गयी,
मैं कभी समझ ना सका,
कब ये छोटी सी दूरी,
मीलों के फासलों में तब्दील हो गयी,
कुछ मिनटों में सब कुछ गुज़र गया,
अगर कुछ बचा,
तो सिर्फ़ प्लेटफ़ॉर्म,
भीड़,
लोगों को दूर करती खिड़कियाँ,
और मैं |
शौर्य जीत सिंह
१२/०५/२०१२
दिल्ली
दो गुज़रती हुई ट्रेनों की खिड़कियों के बीच,
उसका चेहरा दिखा,
और कुछ देर बाद,
ओझल हो गया,
ना जाने कौन सी खिड़की में गुम हो गया,
मुलाक़ात बरसों बाद की थी,
जो शुरुआत से पहले ही ख़तम हो गयी,
मैं कभी समझ ना सका,
कब ये छोटी सी दूरी,
मीलों के फासलों में तब्दील हो गयी,
कुछ मिनटों में सब कुछ गुज़र गया,
अगर कुछ बचा,
तो सिर्फ़ प्लेटफ़ॉर्म,
भीड़,
लोगों को दूर करती खिड़कियाँ,
और मैं |
शौर्य जीत सिंह
१२/०५/२०१२
दिल्ली
धुँधले रिश्ते
पुरानी किसी किताब के,
धुँधले हो चुके शब्दों के,
मायने नहीं बदले अब तक,
हाँ अब पढ़े नहीं जाते,
इसलिए याद कम रहते हैं |
धुँधले हो चुके शब्दों के,
मायने नहीं बदले अब तक,
हाँ अब पढ़े नहीं जाते,
इसलिए याद कम रहते हैं |
पुराने दोस्त,
जिनसे मिलना नहीं होता,
अहमियत उनकी,
अभी उतनी ही है,
हाँ अब रोज़ बातें नहीं करते |
जिनसे मिलना नहीं होता,
अहमियत उनकी,
अभी उतनी ही है,
हाँ अब रोज़ बातें नहीं करते |
ऐसे और भी कई रिश्ते हैं,
जो समय की रेत पर,
पुरानी किताब के,
धुँधले शब्दों की तरह,
रोज़ धुँधले हो रहे हैं,
पर हमेशा सबसे ख़ास बने रहते हैं |
जो समय की रेत पर,
पुरानी किताब के,
धुँधले शब्दों की तरह,
रोज़ धुँधले हो रहे हैं,
पर हमेशा सबसे ख़ास बने रहते हैं |
--
शौर्य जीत सिंह
१२/०५/२०१२
दिल्ली
१२/०५/२०१२
दिल्ली
Monday, May 07, 2012
याद आएगा
सोचता हूँ तुझे याद करूंगा,
तो क्या क्या याद आएगा |
तो क्या क्या याद आएगा |
रात को जगना सोचूंगा या,
चलना संग याद आएगा,
याद आएगा सपने बुनना,
या झूठे वादे मेरे,
तेरी भीगी पलकें सोचूँ,
या हँसना याद आएगा |
चलना संग याद आएगा,
याद आएगा सपने बुनना,
या झूठे वादे मेरे,
तेरी भीगी पलकें सोचूँ,
या हँसना याद आएगा |
सोचता हूँ तुझे याद करूंगा,
तो क्या क्या याद आएगा |
तो क्या क्या याद आएगा |
साँसों की आवाज़ सुनूँ फिर,
या अपने गुस्सम-गुस्से,
बिना बात के लम्बे झगड़े,
चुप होना याद आएगा,
मेरी कविता के मतलब को,
नहीं समझ पाना तेरा,
मेरा फिर खुश हो कर तुझको,
समझाना याद आएगा |
या अपने गुस्सम-गुस्से,
बिना बात के लम्बे झगड़े,
चुप होना याद आएगा,
मेरी कविता के मतलब को,
नहीं समझ पाना तेरा,
मेरा फिर खुश हो कर तुझको,
समझाना याद आएगा |
सोचता हूँ तुझे याद करूंगा,
तो क्या क्या याद आएगा |
तो क्या क्या याद आएगा |
क्या सोचूँ क्या मिस कर दूँ इनमे,
लिस्ट बहुत ये लम्बी है,
भूला कुछ तो झगड़ोगे फिर,
हाँ ये भी याद आएगा |
भूला कुछ तो झगड़ोगे फिर,
हाँ ये भी याद आएगा |
तेरी यादों से रौशन हूँ,
और नहीं कुछ पास मेरे,
और ना हो कुछ हासिल मुझको,
बस ये संग रह जाएगा |
और नहीं कुछ पास मेरे,
और ना हो कुछ हासिल मुझको,
बस ये संग रह जाएगा |
सोचता हूँ तुझे याद करूंगा,
तो क्या क्या याद आएगा |
तो क्या क्या याद आएगा |
--
शौर्य जीत सिंह,
०४/०५/२०१२
दिल्ली से जयपुर तक
०४/०५/२०१२
दिल्ली से जयपुर तक
Thursday, April 19, 2012
त्रिवेणी
मुश्किल है ये कह पाना कि ज़िन्दगी किस पल में है,
ये बहती रहती है पलों के उतारों चढ़ावों के बीच,
हर पल यही सोच के जी लेता हूँ हिस्सा कोई भी ज़िन्दगी का छूट ना जाये.
--
शौर्य जीत सिंह
मुंबई, १४/०४/२०१२
ये बहती रहती है पलों के उतारों चढ़ावों के बीच,
हर पल यही सोच के जी लेता हूँ हिस्सा कोई भी ज़िन्दगी का छूट ना जाये.
--
शौर्य जीत सिंह
मुंबई, १४/०४/२०१२
Monday, April 16, 2012
गुलज़ार हुआ
हवा आज फिर से दरवाजा धकेल कर घर में आ गयी,
अलबत्ता जिसके सफ़हे फड़फड़ा सके,ऐसी कोई किताब ना मिली, ,
वो कमरा तुम्हारे जाने के बाद से ही खाली है.
-
शौर्य जीत सिंह
०५/०४/२०१२
जमशेदपुर
(गुलज़ार साहब के लिए)
अलबत्ता जिसके सफ़हे फड़फड़ा सके,ऐसी कोई किताब ना मिली, ,
वो कमरा तुम्हारे जाने के बाद से ही खाली है.
-
शौर्य जीत सिंह
०५/०४/२०१२
जमशेदपुर
(गुलज़ार साहब के लिए)
Tuesday, March 13, 2012
खट्टे फ्लेवर
बक्सा एक,
किताबों से भरा हुआ,
बंद रखा है
कई महीनों से,
आलमारी के ऊपर कमरे में,
ख्याल कुछ कच्चे से,
बंद किये थे उनमे,
सोचा था खोलूँगा,
सोचा था खोलूँगा,
तो पक कर निकलेंगे,
अभी भी उतने ही खट्टे लगते हैं,
समझ का कोई भी स्वाद,
चढ़ा नहीं है उन पर,
इतने महीनों में,
सोचता हूँ,
फिर से बंद कर दूँ इन्हें बक्से में,
या खट्टा ही रहने दूँ,
कुछ नया फ्लेवर लायेंगे,
फ़ीके से शब्दों के अट-पटे से अर्थों में.
--
शौर्य जीत सिंह
जमशेदपुर,
१३ मार्च 2012
Thursday, February 23, 2012
त्रिवेणी
खिड़कियाँ खुली रह गयीं बीती रात घर की,
हवा ठंडा कर गयी मुझको तमाम कोशिशों के बाद भी,
अक्ल की कई तहों के नीचे था - मन ठंडा ना हुआ.
--
शौर्य जीत सिंह
२२/०२/२०१२
जमशेदपुर
Tuesday, February 21, 2012
सफ़र
ये दुनिया बहुत छोटी है,
लोग चौबीस घंटों में अमरीका पहुँच जाया करते हैं,
तुमसे तो फिर,
टूटे ही सही,
दिल के कुछ तार भी बंधे हैं,
कहीं तो मिलोगे,
कोई पहाड़ी,
कोई झरना,
कोई मिट्टी का टीला,
सूना सा होगा,
कहीं तो होगा,
जहाँ सफ़र ख़तम होगा मेरा.
--
शौर्य जीत सिंह
०५/०२/२०१२
गंगटोक
Sunday, February 12, 2012
शकलों के आईने
शकलें आईने में दिखतीं,
ग़ैरत होती,
शकलें तो आँखों में दिखती हैं,
इसीलिए,
स्नेह से भरी चार आँखें,
मिलते ही,
झुक जाती हैं.
--
शौर्य जीत सिंह
गंगटोक, ०७/०२/२०१२
तो लोगों में शर्म होती,
लिहाज़ होता,ग़ैरत होती,
शकलें तो आँखों में दिखती हैं,
इसीलिए,
स्नेह से भरी चार आँखें,
मिलते ही,
झुक जाती हैं.
--
शौर्य जीत सिंह
गंगटोक, ०७/०२/२०१२
Saturday, February 11, 2012
त्रिवेणी
१. रास्ता कुछ सौ किलोमीटर का था, कई पुल थे उनपे,
हम हर बार अपना रास्ता बदल कर तीस्ता के दायें बाएं होते रहे,
कम्बख्त तीस्ता ने अपना रास्ता एक बार भी नहीं बदला हमारे लिए.
२. बड़े कठोर होते हैं ये पहाड़ भी,
सदियों से अडिग, सब कुछ सहते हुए,
जब दर्द हद से गुज़र जाये, तो इनसे भी झरने छूट जाया करते हैं.
३. तुम ढुलकते रहना मेरे कंधे पर,
मैं सम्हालता रहूँगा हर बार तुमको,
मैं लड़खड़ाउंगा नहीं, जब तक साथ हो तुम.
४. नज़रें मिला कर, झुका कर, झगड़ कर, मुस्कुरा कर,
हम बहुत देर तक एक ही दिशा में साथ चलते रहे,
जाने मैं उसके पीछे था या वो मेरे.
--
शौर्य जीत सिंह
०५-०७/०२/२०१२
जलपाईगुड़ी, गंगटोक,लाचुंग, यूमथांग
हम हर बार अपना रास्ता बदल कर तीस्ता के दायें बाएं होते रहे,
कम्बख्त तीस्ता ने अपना रास्ता एक बार भी नहीं बदला हमारे लिए.
२. बड़े कठोर होते हैं ये पहाड़ भी,
सदियों से अडिग, सब कुछ सहते हुए,
जब दर्द हद से गुज़र जाये, तो इनसे भी झरने छूट जाया करते हैं.
३. तुम ढुलकते रहना मेरे कंधे पर,
मैं सम्हालता रहूँगा हर बार तुमको,
मैं लड़खड़ाउंगा नहीं, जब तक साथ हो तुम.
४. नज़रें मिला कर, झुका कर, झगड़ कर, मुस्कुरा कर,
हम बहुत देर तक एक ही दिशा में साथ चलते रहे,
जाने मैं उसके पीछे था या वो मेरे.
--
शौर्य जीत सिंह
०५-०७/०२/२०१२
जलपाईगुड़ी, गंगटोक,लाचुंग, यूमथांग
Monday, January 30, 2012
कोणार्क में, पुल पर
समुद्र के नज़दीक वाले,
नदी के पुल पर,
हमेशा यही सोचता हूँ,
क्या होता होगा,
जब बहती हुई नदी,
मिलती होगी, समुद्र में,
अचानक से थम जाती होगी,
समुद्र के उथल-पुथल वाले पानी में,
या लोग कहते हैं,
एक लकीर सी पड़ जाती है,
निशान बन जाते हैं,
नदी के बहाव में.
बताना शायद मुश्किल होता होगा,
नदी कहाँ ख़त्म हुई,
और समुद्र की शुरुआत कहाँ हुई.
सोचता हूँ,
मिलूंगा तुझसे तो क्या होगा,
थम जाऊंगा,
या निशान पड़ेगा मुझ पर.
--
शौर्य जीत सिंह
पुरी से कोणार्क के बीच- २७/०१/२०१२
जमशेदपुर - ३०/०१/२०१२
Friday, January 20, 2012
सूखे फूल
एक किताब है,
कुछ सौ-इक पन्नों की,
पढ़ा नहीं उसको कभी पर,
हमेशा सिरहाने रख कर सोता हूँ,
जिन शब्दों के मायने नहीं मालूम,
महसूस करता हूँ उनको,
बिखरी हुई पत्तियों वाला,
एक सूखा फूल है उसमें,
पड़ा रहता है खामोश सा,
उन्ही दो पन्नों के बीच,
खुशबू तो नहीं देता,
पर उससे ही महकता रहता हूँ,
रात भर.
--
शौर्य जीत सिंह
२०-०१-२०१२, जमशेदपुर
कुछ सौ-इक पन्नों की,
पढ़ा नहीं उसको कभी पर,
हमेशा सिरहाने रख कर सोता हूँ,
जिन शब्दों के मायने नहीं मालूम,
महसूस करता हूँ उनको,
बिखरी हुई पत्तियों वाला,
एक सूखा फूल है उसमें,
पड़ा रहता है खामोश सा,
उन्ही दो पन्नों के बीच,
खुशबू तो नहीं देता,
पर उससे ही महकता रहता हूँ,
रात भर.
--
शौर्य जीत सिंह
२०-०१-२०१२, जमशेदपुर
Friday, January 13, 2012
झगड़ा
झगड़ा कई बरसों का था,
और निपटारा आज होना था.
मैंने त्योरियाँ चढ़ा रखी थी,
और जान बूझ कर,
नज़रंदाज़ किया उसकी हर हरकत को,
कुछ धमकियाँ भी दीं, कनखियों से,
वो मुस्कुरा के चल दिया,
मानो उसकी आँखों ने कहा हो,
ले तू आज फिर से हार गया.
--
शौर्य जीत सिंह
१४/०१/२०१२
जमशेदपुर
और निपटारा आज होना था.
मैंने त्योरियाँ चढ़ा रखी थी,
और जान बूझ कर,
नज़रंदाज़ किया उसकी हर हरकत को,
कुछ धमकियाँ भी दीं, कनखियों से,
वो मुस्कुरा के चल दिया,
मानो उसकी आँखों ने कहा हो,
ले तू आज फिर से हार गया.
--
शौर्य जीत सिंह
१४/०१/२०१२
जमशेदपुर
तू आदत है
तू वो आदत है,
जो छूटती नहीं,
तू वो सपना है,
जिसे खुली आँखों से देखता हूँ,
तू वो धुन है,
जिसे हर बार,
अकेले में गुनगुनाता हूँ,
तू वो आहट है,
जो कानों से ओझल नहीं होती,
तू वो तन्हाई है,
जो मेले सी लगती है,
तू वो खुशबू है,
जिससे लोग मुझे पहचान लेते हैं,
तू वो तकिया है,
जिससे चेहरा ढक कर,
कभी भी रो लेता हूँ,
तू वो कोना है दिल का,
जो गीला रहता है, हर वक़्त,
हाँ, तू वही एक आदत है,
जो छूटती नहीं!
--
शौर्य जीत सिंह
०१/११/२०११
जमशेदपुर
जो छूटती नहीं,
तू वो सपना है,
जिसे खुली आँखों से देखता हूँ,
तू वो धुन है,
जिसे हर बार,
अकेले में गुनगुनाता हूँ,
तू वो आहट है,
जो कानों से ओझल नहीं होती,
तू वो तन्हाई है,
जो मेले सी लगती है,
तू वो खुशबू है,
जिससे लोग मुझे पहचान लेते हैं,
तू वो तकिया है,
जिससे चेहरा ढक कर,
कभी भी रो लेता हूँ,
तू वो कोना है दिल का,
जो गीला रहता है, हर वक़्त,
हाँ, तू वही एक आदत है,
जो छूटती नहीं!
--
शौर्य जीत सिंह
०१/११/२०११
जमशेदपुर
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