Thursday, April 19, 2012

त्रिवेणी

मुश्किल है ये कह पाना कि ज़िन्दगी किस पल में है,
ये बहती रहती है पलों के उतारों चढ़ावों के बीच,

हर पल यही सोच के जी लेता हूँ हिस्सा कोई भी ज़िन्दगी का छूट ना जाये.

--
शौर्य जीत सिंह
मुंबई, १४/०४/२०१२

Monday, April 16, 2012

गुलज़ार हुआ

हवा आज फिर से दरवाजा धकेल कर घर में आ गयी,
अलबत्ता जिसके सफ़हे फड़फड़ा सके,ऐसी कोई किताब ना मिली, ,

वो कमरा तुम्हारे जाने के बाद से ही खाली है.

 -
शौर्य जीत सिंह
०५/०४/२०१२
जमशेदपुर
(गुलज़ार साहब के लिए)

Tuesday, March 13, 2012

खट्टे फ्लेवर

बक्सा एक,
किताबों से भरा हुआ,
बंद रखा है
कई महीनों से,
आलमारी के ऊपर कमरे में,

ख्याल कुछ कच्चे से,
बंद किये थे उनमे,
सोचा था खोलूँगा,
तो पक कर निकलेंगे,

अभी भी उतने ही खट्टे लगते हैं,
समझ का कोई भी स्वाद,
चढ़ा नहीं है उन पर,
इतने महीनों में,

सोचता हूँ,
फिर से बंद कर दूँ इन्हें बक्से में,
या खट्टा ही रहने दूँ,
कुछ नया फ्लेवर लायेंगे,
फ़ीके से शब्दों के अट-पटे से अर्थों में.

--
शौर्य जीत सिंह
जमशेदपुर,
१३ मार्च 2012

Thursday, February 23, 2012

त्रिवेणी


खिड़कियाँ खुली रह गयीं बीती रात घर की,
हवा ठंडा कर गयी मुझको तमाम कोशिशों के बाद भी,

अक्ल की कई तहों के नीचे था - मन ठंडा ना हुआ.

--
शौर्य जीत सिंह
२२/०२/२०१२
जमशेदपुर

Tuesday, February 21, 2012

सफ़र


ये दुनिया बहुत छोटी है,
लोग चौबीस घंटों में अमरीका पहुँच जाया करते हैं,
तुमसे तो फिर,
टूटे ही सही,
दिल के कुछ तार भी बंधे हैं,
कहीं तो मिलोगे,
कोई पहाड़ी,
कोई झरना,
कोई मिट्टी का टीला,
सूना सा होगा,
कहीं तो होगा,
जहाँ सफ़र ख़तम होगा मेरा.

--
शौर्य जीत सिंह
०५/०२/२०१२
गंगटोक

Sunday, February 12, 2012

शकलों के आईने

शकलें आईने में दिखतीं,
तो लोगों में शर्म होती,
लिहाज़ होता,
ग़ैरत होती,

शकलें तो आँखों में दिखती हैं,
इसीलिए,
स्नेह से भरी चार आँखें,
मिलते ही,
झुक जाती हैं.

--
शौर्य जीत सिंह
गंगटोक, ०७/०२/२०१२

Saturday, February 11, 2012

त्रिवेणी

१. रास्ता कुछ सौ किलोमीटर का था, कई पुल थे उनपे,
    हम हर बार अपना रास्ता बदल कर तीस्ता के दायें बाएं होते रहे,

    कम्बख्त तीस्ता ने अपना रास्ता एक बार भी नहीं बदला हमारे लिए.

२. बड़े कठोर होते हैं ये पहाड़ भी,
    सदियों से अडिग, सब कुछ सहते हुए,

    जब दर्द हद से गुज़र जाये, तो इनसे भी झरने छूट जाया करते हैं.

३. तुम ढुलकते रहना मेरे कंधे पर,
    मैं सम्हालता रहूँगा हर बार तुमको,

   मैं लड़खड़ाउंगा नहीं, जब तक साथ हो तुम.

४. नज़रें मिला कर, झुका कर, झगड़ कर, मुस्कुरा कर,
    हम बहुत देर तक एक ही दिशा में साथ चलते रहे,

    जाने मैं उसके पीछे था या वो मेरे.

--
शौर्य जीत सिंह
०५-०७/०२/२०१२
जलपाईगुड़ी, गंगटोक,लाचुंग, यूमथांग

Monday, January 30, 2012

कोणार्क में, पुल पर


समुद्र के नज़दीक वाले,
नदी के पुल पर,
हमेशा यही सोचता हूँ,
क्या होता होगा,
जब बहती हुई नदी,
मिलती होगी, समुद्र में,
अचानक से थम जाती होगी,
समुद्र के उथल-पुथल वाले पानी में,
या लोग कहते हैं,
एक लकीर सी पड़ जाती है,
निशान बन जाते हैं,
नदी के बहाव में.

बताना शायद मुश्किल होता होगा,
नदी कहाँ ख़त्म हुई,
और समुद्र की शुरुआत कहाँ हुई.

सोचता हूँ,
मिलूंगा तुझसे तो क्या होगा,
थम जाऊंगा,
या निशान पड़ेगा मुझ पर.

--
शौर्य जीत सिंह
पुरी से कोणार्क के बीच- २७/०१/२०१२
जमशेदपुर - ३०/०१/२०१२

Friday, January 20, 2012

सूखे फूल

एक किताब है,
कुछ सौ-इक पन्नों की,
पढ़ा नहीं उसको कभी पर,
हमेशा सिरहाने रख कर सोता हूँ,
जिन शब्दों के मायने नहीं मालूम,
महसूस करता हूँ उनको,

बिखरी हुई पत्तियों वाला,
एक सूखा फूल है उसमें,
पड़ा रहता है खामोश सा,
उन्ही दो पन्नों के बीच,
खुशबू तो नहीं देता,
पर उससे ही महकता रहता हूँ,
रात भर.

--
शौर्य जीत सिंह
२०-०१-२०१२, जमशेदपुर

Friday, January 13, 2012

झगड़ा

झगड़ा कई बरसों का था,
और निपटारा आज होना था.

मैंने त्योरियाँ चढ़ा रखी थी,
और जान बूझ कर,
नज़रंदाज़ किया उसकी हर हरकत को,
कुछ धमकियाँ भी दीं, कनखियों से,

वो मुस्कुरा के चल दिया,
मानो उसकी आँखों ने कहा हो,
ले तू आज फिर से हार गया.

--
शौर्य जीत सिंह
१४/०१/२०१२
जमशेदपुर

तू आदत है

तू वो आदत है,
जो छूटती नहीं,
तू वो सपना है,
जिसे खुली आँखों से देखता हूँ,
तू वो धुन है,
जिसे हर बार,
अकेले में गुनगुनाता हूँ,
तू वो आहट है,
जो कानों से ओझल नहीं होती,
तू वो तन्हाई है,
जो मेले सी लगती है,
तू वो खुशबू है,
जिससे लोग मुझे पहचान लेते हैं,
तू वो तकिया है,
जिससे चेहरा ढक कर,
कभी भी रो लेता हूँ,
तू वो कोना है दिल का,
जो गीला रहता है, हर वक़्त,

हाँ, तू वही एक आदत है,
जो छूटती नहीं!

--
शौर्य जीत सिंह
०१/११/२०११
जमशेदपुर
जो बातें कभी कह ना पाऊँ,
उन्हें खुद से समझ लेना तुम,

ज़रा कच्चा हूँ बोलने में - इसीलिए लिख लेता हूँ!!

शौर्य जीत सिंह
०४/११/२०११
जमशेदपुर
कौन कहता है दर्द की इंतेहा होती है !!
यूँ तो तेरी हर अगली मुलाक़ात से पहले अनगिनत पल होते हैं !!

--
शौर्य जीत सिंह
२६/११/२०११
जमशेदपुर

Wednesday, October 19, 2011

सन्नाटे

सन्नाटे,
आसमान से टूट कर गिरते रहे,
और मैं
सपने के बिखरे काँचों को
सन्नाटों से जोड़ता रहा,

उस काँच में
शकल तो दिखती है
पर कई हिस्सों में बँटा हुआ सा लगता हूँ

टूटे हुए रिश्तों को जोड़ना भी कितना मुश्किल है |

शौर्य जीत सिंह
१५/१०/२०११
जमशेदपुर

Monday, October 03, 2011

हर बार

मैं,
उम्र के हर मुकाम पर,
थोडा थोडा,
नाकामयाब होता रहा,
कभी रोया,
कभी खीझा,
हर बार,
थोडा थोडा,
निराश होता रहा,
पर भूल गया शायद,
इस सब के बीच,
की हर बार,
थोडा थोडा,
परिपक्व होता रहा,
हर बार,
थोडा थोडा,
निखरता रहा सीखता रहा,
हर बार,
थोडा थोडा ही सही,
पर ऊपर उठता रहा ||

शौर्य जीत सिंह
०२-१०-२०११
जमशेदपुर

Saturday, July 16, 2011

जब बिजली गुल हुई

बीती रात,
जब बिजली गुल हुई,
तो एहसास हुआ,
यह चाँद,
बादलों के बीच,
कितना खूबसूरत दिखता है,
बीती रात,
जब बिजली गुल हुई..!!

--
शौर्य जीत सिंह
१६ जुलाई २०११
जमशेदपुर

Wednesday, June 29, 2011

तुम और मैं

रिश्तों के कई पन्ने,
कई बार उलटे हैं,
पर उन पर लिखे अक्षर,
धुँधले नहीं हुए अब तक,

दोस्ती की कई परतें,
शरीर पर लगी चोट की तरह,
कई बार उचाड़ी है,
पर हर बार उन पर,
नई चमड़ी उग आती है,

इसीलिए,
लगता है,
तुम्हारे मेरे बीच,
जो पर्दा गिर गया है,
कल फिर से उठेगा ||

--
शौर्य जीत सिंह
२९/०६/२०११
जमशेदपुर

Monday, April 11, 2011

पहचान

मेरी गर्ल-फ्रेंड
कविता है,
नाम नहीं,
पहचान बता रहा हूँ.

यूँ तो सब कुछ
आँखों से कहती है,
मैं बस लफ़्ज़ों में सजा रहा हूँ,
मेरी गर्ल-फ्रेंड कविता है,
नाम नहीं,पहचान बता रहा हूँ.

कोरे पन्ने पर
स्याही सी सजती है
मैं बस सबको सुना रहा हूँ,
मेरी गर्ल-फ्रेंड कविता है,
नाम नहीं,पहचान बता रहा हूँ.

महीनों तक नहीं आती,
कभी जब रूठ जाती है,
तुम्हे नग्में सी लगती है,
मैं बस उसको मना रहा हूँ,
मेरी गर्ल-फ्रेंड कविता है,
नाम नहीं,पहचान बता रहा हूँ.

-- शौर्य जीत सिंह
१०/४/२०११

Friday, February 18, 2011

छोटू

नाम तो कई थे उसके,
मैं,
अक्सर छोटू बुलाता था.
नुक्कड़ की चाय वाले का,
नया छोटू था.

खाकी निक्कर पहना करता था,
लम्बी थी उससे,
टाँगों तक पहुँचती थी,
शर्ट ठीक ठीक याद नहीं,
दो थीं शायद,
प्रमोशन भी हुआ था इधर उसका,
आज कल चाय भी बनाता था,
सोता भी उसी दुकान में,
एक कोने में था,

गए दंगो के बाद से दिखता नहीं,
दुकान पे चाय का स्वाद तो पहले सा ही है,
रंग कभी हरा तो कभी सिंदूरी लगता है..!!

शौर्य जीत सिंह
१५/०२/२०११
आग लिखी थी कुछ पन्नो पर,
आज सिर्फ कालिख के निशाँ से बाकी हैं,

दो बूँदें आंसू की गिरी थी एक मर्तबा उनपे!!


शौर्य जीत सिंह
१५/०२/२०११