Sunday, September 30, 2018

हर रोज़,

कितनी ही दफ़ा
हर रोज़,
मिलता बिछड़ता हूँ तुझसे,
बिन बरसे बदल सा,
बस छू कर गुज़रता हूँ तुझको,

कुछ रुकता नहीं तेरे बिन,
तो सब कुछ चलता भी नहीं,
भटकता रहता हूँ,
बेवजह,
ठोकरें खा कर,
सँभलता भी नहीं ,

ठहरता हूँ,
ढूंढता हूँ,
इंतज़ार करता हूँ,
हर रोज़,
मिल कर बिछड़ने का,
और बिछड़ कर मिलने का,

अधूरा हूँ,
पूरा होने की आस में,
ज़िन्दगी के,
उसी एक कतरे की तलाश में ,
कितनी ही दफ़ा
हर रोज़,
मिलता बिछड़ता हूँ तुझसे|

शौर्य जीत सिंह
२९ सितम्बर, २०१८
मुंबई 

Saturday, March 04, 2017

मुझ सा तुम सा

ये जो तुम थोड़े से मुझ से हो गए हो,
और ये जो मैं भी,
थोड़ा ही सही,
तुम सा हो गया हूँ। 

ये जो तुम,
थोड़े बेफिक्र हो गए हो,
और जो मैं थोड़ा फिक्रमंद हो गया हूँ। 

ये जो तुम कुछ संजीदा हो गए ,
और जो मैं थोड़ी शरारतें करने लगा हूँ। 

ये जो तुमने नाक पे थोड़ा गुस्सा चढ़ा लिया,
और जो मैं चहकने लगा हूँ। 

ये जो तुमने हल्के से मुस्कुराना सीख लिया,
और जो मैं दिल खोल के,
हँसने लगा हूँ। 

ये जो तुम कुछ साँवले हो गए हो,
और जो मैं चमकने लगा हूँ। 

ये जो तुम मुझ से और मैं तुम सा हो गया हूँ,
ये जो मैंने तुमको अपनाया है,
और तुमने मुझे आत्मसात किया है।,
तुम चाहो तो कुछ नाम दे दो इसको 
मेरे लिए ये अदला बदली ही काफी है। 

शौर्य जीत सिंह 
६ फरवरी , २०१७ 
कोलकाता 

धुंध

ये जो हल्की हल्की सी धुंध है,
बहुत कुछ तुम सी लगती है।
नज़र जो आता है इसमें,
हमेशा वो नहीं होता,
कि जैसे बातें तुम अक्सर,
छुपा के मुझसे रखते हो,
उसी तरह ये हल्की धुंध भी, 
बोले बिना कुछ भी,
ना जाने क्या नहीं कहती। 

कि इसके पर क्या है,
हर दफा मैं पढ़ नहीं पाता,
मगर जो इक सुकूँ है,
धुंध की खामोश ठिठुरन में,
तेरे आगोश में जैसे जहाँ से,
मैं बड़ा महफूज़ रहता हूँ। 

जो हल्की धुंध है तुम सी,
बड़ी अपनी सी लगती है 

शौर्य जीत सिंह 
२० दिसंबर, २०१६ 
आजमगढ़ 

Saturday, October 22, 2016

अस्तित्व

याद है तुमको,
वो बारिशों के दिन,
जब मौसम की पहली झमाझम बारिश के बाद,
मटमैले पत्तों वाला बूढा बरगद,
अपने पत्तों से गर्द हटा कर,
कैसे हरा हो जाता था,
फिर से लहलहा जाता था,
और एहसास करा जाता था,
हमें,
अपने होने का.

यूँ ही कभी,
बिन बताये ,
तुम आओ,
और मैं लहक जाऊँ ,
तो शायद एहसास कर पाओगे,
तुम भी,
मेरे होने का.


--
शौर्य जीत सिंह
१६.०६.२०१६, कोलकाता


Sunday, May 08, 2016

माँ

नहीं आती समझ मुझको , कठिन शब्दों की भाषाएँ ,
मेरी माँ रूठ जाए तो, गलत हूँ जान लेता हूँ.

नहीं ख्वाहिश है पाने की, ना खोने का है डर मुझको,
तेरे सीने से लग जाऊँ , तो दुनिया भूल जाता हूँ.

सभी दौड़ें जिन्हे मैं हार कर, घर लौट आया था,
तेरी इक डाँट पर मैं, सारा जग ये जीत आया हूँ.

अकेला मैं नहीं पड़ता, भले हालत जैसे हों ,
तेरी तस्वीर हो दिल में, मैं आगे बढ़ निकलता हूँ.

नहीं सज़दे किये मैंने, खुद को भी नहीं जाना,
तेरे पैरों को छू कर, उसको जन्नत मान लेता हूँ.

-
शौर्य जीत सिंह
०८ मई २०१६ , कोलकाता 

Saturday, March 26, 2016

बबलू बन्दर - 2

बबलू बन्दर जब भी आते,
धमा चौकड़ी खूब मचाते,
दादा जी को खूब छकाते ,
पर दादी को बहुत लुभाते,

दादा लाठी ले कर आते,
दादा जी जब उन्हें डराते,
दादी हलवा पूड़ी लाती,
फिर कल आना ये बतलाती,

अपने बबलू होशियार हैं,
पढ़े लिखे और समझदार हैं,
छत पर बस तब ही हैं आते,
दादा जी जब ऑफिस जाते।

--
शौर्य जीत सिंह
१४-०३-२०१६, कोलकाता



सूखती स्याही

कुछ दिन यूँ ख़ामोश गुज़रे पन्नो पर,
ऐसा लगा,
स्याही सूख गयी मेरी कलम से,
हमेशा के लिए।

जो कल तेरी याद में,
दो आँसू गिरे,
रंग फिर से उतर आये पन्नों पर,
और यकीन हुआ,
ना ये ग़म गुज़रेगा,
ना ये स्याही सूखेगी।

कभी ये स्याही,
दर्द की परतों को गीला कर जाती है,
तो कभी दर्द,
सूखती स्याही को ज़िन्दगी दे जाता है।

दोनों अधूरे हैं,
एक दूसरे के बिना,
मुक़म्मल हो जाते,
तो कविता ना होती शायद।

--
शौर्य जीत सिंह
१४-०३-२०१६, कोलकाता 

Sunday, October 04, 2015

तू कुछ कुछ मेरे जैसी है

तू कुछ कुछ मेरे जैसी है

मेरे जैसी इन आँखों में
मेरे जैसे कुछ सपने हो
औने पौने जिन सपनो को
जी भर कर मैंने जिया नहीं
बस ललचाया जिनकी खातिर
तेरी आँखों से देखूँगा
मूरत मैंने जो गढ़ी नहीं
तेरी उंगली से सींचूंगा

पूरा मुझमें कुछ नहीं अगर
तू पूरक मेरे जीवन की
आँसू मेरे,मुस्कान मेरी
सम्मान मेरा , अभिमान मेरा

तू कुछ कुछ मेरे जैसी है

--
२३/०९/२०१५, वाराणसी

Saturday, June 13, 2015

मेरी अधूरी कविता

लाख कोशिशों के बाद भी,
तुम पूरी नहीं होती|
कभी मेरे ख़याल कुछ कम पड़ जाते हैं
जो तुम्हारे दर्द की गहराई तक जाते हों,
कभी कुछ अलफ़ाज़ नहीं मिलते
जो तुम्हारी ख़ुशी बयान कर सकते हो|
मुक़म्मल हासिल नहीं होती मुझको
टूटी फूटी,
कुछ बिखरी बिखरी सी,
कतरों में मिलती हो|

तुम्हारे कुछ टुकड़े जोड़ कर
मैंने अपनी ज़िन्दगी बनाई है
बिना तुम्हारे ज़ख्मों की दरारों के,
ज़िन्दगी मेरी भी अधूरी है|

शौर्य जीत सिंह
१२-१३ जून, २०१५
कोलकाता

Tuesday, June 09, 2015

किसी मोड़ पे मिल जाऊँ

आज भी वैसे लगते हो
जैसे बरसों पहले थे,
मुस्कान कुछ बदल सी गयी है तुम्हारी,
और मेरी पहचान |
अगर कुछ नहीं बदला,
तो हमारे भीतर का एक इन्सान,
जो आज भी,
तुमको,
तुम्हारी आँखों के रंग से पहचान लेता है |

बरसों बाद,
कभी किसी मोड़ पर मिल जाऊँ अगर
मेरे माथे की सिलवटों से, 
मेरी अधूरी कविताओं का दर्द तो गिन लोगे?

--
शौर्य जीत सिंह
09 जून २०१५, कोलकाता

Friday, April 03, 2015

बबलू बन्दर

बबलू बन्दर बैठा छत पर 
दाँत निपोड़े हर आहट पर 
खी खी कर के हमें डराए  
लट्ठ दिखाओ झट भग जाए। 

चोरी कर मोबाइल लाया 
हर बन्दर को फ़ोन लगाया 
सुनी किसी ने एक नहीं पर 
दिन भर कितना ज़ोर लगाया। 

चोरी का ये खेल बुरा है 
पर बबलू को नहीं पता है 
चिंटू ने अब पुलिस बुलाई 
बबलू की है शामत आई।  

०३/०४/२०१५, ग़ाज़ियाबाद 


Wednesday, April 01, 2015

फ़िर से अपना बचपन देखा

आज फ़िर  से अपना बचपन देखा,
जब माँ से बिछड़ते हुए 
स्टेशन पे,
एक बच्चे की आँखें नम हो गयी।

रुँधे हुए गले से निकले शब्द 
टूटे काँच जैसे 
कानों पर बिखरते थे,
और छोड़ जाते थे 
एक गहरी खरोंच 
मेरे मन पे। 

जल्दी लौट आने का वादा दे कर 
जो बच्चा बाप के साथ 
ट्रेन में चढ़ गया 
मेरे अतीत का ही कोई हिस्सा था। 

जो आँसू की एक बूँद मेरी आँख से टपकी 
कुछ बीस साल पुरानी थी शायद। 

३१ मार्च २०१५, आज़मगढ़ 

Monday, October 20, 2014

इस बार

मद्धम आँच पर,
सभी कदम सेंके हैं,
इस बार,
थोड़ा उबल कर देखूँगा.

मुस्कुराता रहा सबके सामने,
लोग परेशान ना हो मेरी आवाज़ से,
इस बार,
थोड़ा हँस कर देखूँगा.

सारे आँसू
अभी भीतर रखे हैं मन के,
कमज़ोर ना लग जाऊँ औरों को,
इस बार,
थोड़ा रो कर देखूँगा.

धीमी रफ़्तार से,
चलता रहा उम्र भर,
गिर ना जाऊँ, कहीं इस डर से,
इस बार,
थोड़ा उड़ कर देखूँगा.

जद्दोजहद और भागम-भाग में ज़िंदगी की,
जाने कितने अपनों को,
पीछे छोड़ आया हूँ,
इस बार,
थोड़ा मुड़ कर देखूँगा.

एक बार ही सही,
थोड़ी सी ज़िंदगी,
जी कर देखूँगा.

--
12 अक्टूबर 2014,
दिल्ली

Monday, July 14, 2014

बाकी है

अभी कुछ आस बाकी है,
अभी कुछ साँस बाकी है,
बुझूँ तो भस्म हो जाऊँ ,
अभी कुछ आग बाकी है |

अभी गलियों का सूनापन,
नहीं पसरा मेरे घर तक,
कहाँ से अलविदा कह दूँ,
वो कुछ जज़्बात बाकी है |

सभी दौड़ें नही हारा,
भले पीछे रहा हूँ मैं,
नही मंज़िल मिली तो क्या,
अभी कुछ राह बाकी है |

ख़तम सब कुछ हुआ,
या रह गया इंसान कुछ मुझमें,
स्वयं के ख़त्म होने की,
अभी शुरुआत बाकी है |



२६ अक्टूबर 2013
गाज़ियाबाद

Wednesday, June 11, 2014

त्रिवेणी

एक सपना टूट कर बिखरा ज़मीन पर
बावज़ूद सन्नाटों के कोई आवाज़ ना हुई.

पाँव में चुभे टुकड़े आज भी दुखते हैं.

नई दिल्ली, १२/०६/२०१४ 

Thursday, February 27, 2014

एक लाइन

एक लाइन ,
जो अटकी है मन में,
कुछ वक़्त से,
लाख कोशिशों के बाद भी,
उतरती नहीं पन्नों पर।

कभी आस पास
औरों को देख कर
ठिठक जाती है,
तो कभी अल्फ़ाज़ों के जंगल में
उलझ जाती है,
बड़ी सीधी सादी है,
शरमाती है,
सकुचाती है।

किसी रोज़ फुर्सत सॆ
नज़दीक आ कर,
मेरी आँखों में ही पढ़ लेना तुम,
उस लाइन को
लफ्ज़ नाकाफ़ी होंगे शायद।

२२ फरवरी, २०१४
नई दिल्ली 

Tuesday, February 18, 2014

वहीँ मिलूंगा

बादलों के पार 
चाँद की मद्धम रौशनी से रोशन 
एक टुकड़ा है ज़मीन का
कभी कहा नहीं तुमसे,
पर बरसों पहले तुम्हारी खातिर ही,
छुपाया था उसको वहाँ पर,

बरसों बाद वहीँ मिलूंगा तुमको।

शौर्य जीत सिंह
१८ फरवरी, २०१४
गाज़ियाबाद

Saturday, May 18, 2013

सफ़हे

पुराने कुछ सफहों पर तुम्हारा नाम,
कोडवर्ड में लिखा है,
वो किताबें किसी दराज़ में 
सबसे नीचे दबी रखी  हैं,
जब खोलता हूँ इन दराजों को,
ये मुझसे बातें भी करती हैं,
और कई दिनों बाद मिलूँ,
तो शिकायतें भी करती हैं,

अक्सर सींचता हूँ इनको
अपने आँसू  से,
जब इनपर फूल लगेगा,
तो  भेजूंगा तुमको।

--
शौर्य जीत सिंह
१६/०५/२०१३ 
आजमगढ़ 

इतनी है

दास्तानें कई हैं,
सुनों कौन सी,
कशमकश इतनी है।

मुद्दे कई हैं,
सुलझाऊँ कौन सा,
बहस इतनी है।

कारोबार इत्र का है,
पर तेरी साँसों से जो मिलती है,
महक इतनी है।

पाने को तो
आसमान मेरी मुट्ठी में है,
बस तुझे भी छू लूँ ,
ललक इतनी है।

--
शौर्य जीत सिंह
१६/०५/२०१३
आजमगढ़

कुछ बीस साल बाद


वे रातें,
जो गाँव में,
आसमान के नीचे गुज़रती थी,
कुछ ख़ास था उनमे,

तारों के कई पैटर्न थे,
और उनकी पोजीशन से लेकर,
मूवमेंट तक सब कुछ,
ज़बानी याद हो चला था ,

सप्तर्षि तो रोज़ देखता था,
ध्रुव तारा कभी दिखा नहीं मुझको,
बाबा कहते थे,
वो रात के बारह बजे के बाद दिखता है,
पर आँखें हर रात,
आधी रात से पहले ही,
बोझिल होकर बंद हो जाती थी,

आज कुछ बीस-एक साल बाद,
जगराते तो अक्सर होते हैं,
लेकिन सर के ऊपर पी. ओ. पी. की छत होती है,
जिसके पार,
ना आसमान दिखता है,
ना ध्रुव तार,
और ना ही बाबा।

--
शौर्य जीत सिंह
१६ /०५/२०१३
आजमगढ़